शनिवार, जुलाई 17, 2010

मृतक का अंतिम संस्कार..?

मृतक का अंतिम संस्कार क्या होना चाहिये ? आदिकाल से ही मृतक के संस्कार की अनेक रीति प्रचलन में है । जलाना । दफ़नाना । जल प्रवाह और उसे सङने से बचाने के लिये कोई लेप लगाकर यूँ ही सुखा लेना । किसी विशेष स्थान जिसको बहुत सी जगह मृतक चौरा कहते हैं । वहाँ ऐसी ही लाश रखकर छोङ आना । ममी आदि बना देना । ये कुछ प्रमुख तरीके हैं । जो हमारे समाज में प्रचलित हैं । उस दिन ऐसी
ही बात चल रही थी कि श्री महाराज जी ने मृतक का सबसे उचित अंतिम संस्कार बताकर हमें चौंका दिया । हाँलाकि इस बात से कुछ लोग ऐसे नाखुश हुये कि सतसंग छोङकर चले गये । महाराज जी ने जो तरीका बताया । वो भी कोई नया और स्पेशल नहीं था । कैलाश पर्वत के आसपास के लोग वही
तरीका अपनाते हैं ।अभी का तो मालूम नहीं लेकिन कुछ समय पहले जापान में तो मरने से पूर्व ही वृद्ध ( एक निश्चित उमर के बाद ) लोगों के लिये ये तरीका कानून की तरह लागू था । कैलाश पर्वत के निकट ही एक ऊँचा पर्वत है । जिस पर पत्थर आदि की सीङिया बनाकर पर्वत के ऊपर चौरस स्थान पर लाश को रख आते है । जिसे चील कौवा आदि माँसाहारी पक्षी व अन्य माँस भोजी उसे आहार बना लेते हैं ।
सुनने में यह बात कितनी अटपटी लगती है । मगर ये तरीका एकदम उचित है । आईये इससे जुङे सामाजिक सरोकार और भावनात्मक पहलू पर नजर डालते हैं । सबसे पहले तो ये बात विचार करें कि जो आपका सम्बन्धी था । वो तो चला गया । अब जो शेष रह गया है । वो सिर्फ़ मुर्दा ही है । मुर्दा यानी मिट्टी । और इस मिट्टी के लिये आप लाख जतन करो । ये मिट्टी मिट्टी में ही मिल जानी है । आप लाश को जलाते हो । तो भी पंचतत्व तत्वों में मिल जाते हैं । आप दफ़नाते हो तो भी जमीन के कीङे उसको खाते हैं और शेष मिट्टी हो जाती है । आप जलप्रवाह करते हो । तो भी जलीय जीव जन्तु उसे आहार बनाते हैं ।
अब जलाने । दफ़नाने । और जलप्रवाह और ममी आदि जैसे तरीकों पर विचार करें । सबसे पहले यह सोचें कि एक दिन में विश्व के अन्दर कितने लोग मरते होगें ? जलाने पर जीवन के लिये बहुमूल्य वन सम्पदा ( लकङी ) तथा अन्य पदार्थों का अपव्यय । दफ़नाने पर जमीन का गैर उपयोगी हो जाना । दफ़नाने की क्रिया भी कम खर्चीली नहीं होती । जल प्रवाह में नदी का पानी दूषित होना । क्योंकि लाश पानी में फ़ूलकर सङ जाती है । मृतक चौरा जैसे स्थानों पर छोङ देने पर लाश के सङने पर बीमारी फ़ैलने का खतरा होता है । इस सबके विपरीत माँसाहारी पक्षियों के लिये लाश छोङने पर पक्षी ऐसे स्थान पर तैयार रहते हैं । और कुछ ही घन्टो में लाश का कुदरती ढंग से सफ़ाया हो जाता है । इसका सबसे बङा आध्यात्मिक रहस्य जो महाराज जी ने बताया । वो ये कि मृतक पक्षी आदि अन्य जीवों द्वारा भोजन के रूप में उदरस्थ हो जाने पर मृतक के ऊपर से काफ़ी रिण उतर जाता है । जो कि जाने अनजाने में उसके ऊपर चढा हुआ था । भले ही मृतक ने जीवन भर किसी को पानी के लिये न पूछा हो । पर मरते मरते वह कई जीवों का पेट भर गया । इसका लाभ उसे बारह तेरह दिन की उस यात्रा में मिलता है । जो मरने के बाद " यमपुरी " पहुँचने में होती है । ( प्राण निकलने से लेकर यम दरबार में पेशी होने
तक बारह तेरह दिन का समय लग जाता है । इस बीच मृतक के कर्मों के अनुसार उसकी यात्रा होती है ।
मान लो उसने भूखों प्यासों को भोजन पानी दिया हो तो वो उसे रास्ते में प्राप्त हो जाता है । अन्यथा नहीं । अगर उसने दूसरे के रास्ते से काँटे हटाये हैं । तो उसका भी रास्ता साफ़ होता है । कहने का मतलब जैसा उसने यहाँ किया । ठीक वही उसे प्राप्त होता है । चाहे वो अच्छा हो अथवा बुरा । ) तो इस तरह मान लो अपने स्वभाववश या परिस्थितिवश आदमी कोई परोपकार जीवन में नहीं कर सका । तो मरते मरते ये परोपकार फ़ोकट में हो जाता है । और फ़िर लाश का किसी भी तरह संस्कार करो । उसका अंतिम परिणाम तो उस शरीर का नष्ट होना ही है । अब मान लो कोई व्यक्ति जीवन में माँसाहारी रहा हो । तो विधान के अनुसार आने वाला समय में वो शिकार बनेगा और जिनको उसने खाया था । वो किसी न किसी रूप में उससे बदला लेंगे । यानी खायेंगे । तो इस तरह भी कुछ पाप कम हो जाता है ।
मैंने अक्सर एक बङी विचित्र बात देखी है । कोई भी व्यक्ति जीवन में परोपकार या सदव्यवहार करने से बचता रहता है । और मरने पर अपनी अच्छी स्थिति के लिये बङे बङे उपाय करता है । ये उपाय उसके पुत्रादि द्वारा भी किया जाता है । एक कहावत यू. पी . में बेहद प्रचलित है । " जीयत न दये कौरा । मरे बुझाय चौरा । " इसको मैंने सत्य के रूप में चरितार्थ होते हुये देखा है । और इसका सम्बन्ध अमीरी या गरीबी से न होकर स्वभाव से अधिक है । अधिकांश घर के सम्मानित बुजुर्ग जिन्होंने अपना सारा जीवन उस घर के लिये कुरबान कर दिया । अंतिम समय में आकर उपेक्षित । बीमार और एक वक्त के अच्छे खाने के लिये तरसते रहे । घर में चार लोगों को खाना बिगङकर फ़िंक जाता था । पर उन्हें उनकी बहुओं को दो सूखी रोटी अचार के साथ भी देने पर एतराज था । लेकिन बाद में इनकी मृत्यु होने पर एक लाख से लेकर दो लाख का खर्च करते हुये लोग आराम से देखे गये । भरे हुये
को जबर्दस्ती बुलाकर खिला रहे हो । और वो बेचारा सालो रोटी के लिये । तुम्हारे प्रेम के दो बोल सुनने के लिये तरसता हुआ चला गया । कार्ड में लिख दिया । पिताजी स्वर्गवासी हो गये । और खुद ने ही स्वर्ग से पहले ही " नरक " कैसा होता है । यह अच्छी तरह दिखा दिया । दन्डवत प्रणाम और मृतक शरीर को भोजन के रूप में अर्पित कर देना । दो बेहद रहस्यमय पर अनोखे चमत्कारी फ़ल देने वाले कार्य हैं ।
मृतक के मामले में आप शायद इस आचरण का परिणाम प्रत्यक्ष न देख पायें ( वैसे कुछ लोगों को स्वप्न आदि या किसी अन्य तरीके से अनुभूति हो जाती है ) पर दन्डवत में तो हाथ कंगन को आरसी क्या । पढे लिखे को फ़ारसी क्या । जैसा सीधा मामला है ही ।दन्डवत प्रणाम उसे कहते हैं । जो अपने किसी भी आदरणीय को जमीन पर पेट के बल लेटकर किया जाता । इसमें हाथ जुङे हुये नमस्कार की मुद्रा में सिर के ऊपर एकदम सीधे होते हैं । इसका फ़ल क्या है ? प्रभु के विधान के अनुसार गुरु या अन्य आदरणीय जनों को इस भाँति प्रणाम करने से इस आदर भावना के फ़लस्वरूप तुम्हारे शरीर से पाप ताप प्रथ्वी ले लेती है । ये एक सीधा सरल उपाय मैंने कई लोगों को बताया । और वे अमल में लाये तो उन्होंने अपने जीवन में चमत्कारी अनुकूल परिवर्तन महसूस किये । आजकल के बालक युवक चरण स्पर्श करने के बजाय घुटने छू लेते हैं । माथे आदि से लगाना तो बहुत बङी बात है । वैसा ही हो रहा है । बङों के अनमोल आशीर्वाद से वंचित रहतें हैं । तो बात मृतक संस्कार की हो रही थी । ऊपर मैंने मुख्य मुख्य तथ्य लिख दिये हैं । आप हर पहलू से विचार करेंगे । तो आप कहेंगे । निश्चित ही श्री महाराज जी का बताया तरीका मानव हित और कई अन्य पहलूओं से श्रेष्ठ ही है ।

3 टिप्‍पणियां:

Divya ने कहा…

achhi jaankari !...aabhar !

संगीता पुरी ने कहा…

इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिंदी चिट्ठाजगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

dr.damodar ने कहा…

आध्यात्मिक ग्यान की सरिता प्रवाहित हो रही है आपके इस आलेख में। आभार!

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